यदि हम किसी देश या धर्म का इतिहास जानना चाहते है तो उसके भूतकाल को जानना बहुत जरुरी हो जाता है, इसी तरह यदि हम किसी प्रदेश के वर्तमान को जानना चाहते है तो उसके पिछले वर्षों को जाने बिना, वर्तमान को जानना और समझना बहुत मुश्किल हो जाता है यहाँ जम्मू कश्मीर का इतिहास और पुराण कथाएं जानेंगे
कानून या नियम तो यह है यदि किसी समाज या धर्म का इतिहास के वर्तमान को जानना है तो उसके पिछले वर्षों को जानना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है लेकिन आज की राजनीति इस तरह से लोगो के उपर हावी है कि समाज उसके पीछे कुछ भी जानना नहीं चाहते है
अक्सर वर्तमान के सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों को सुलाने फिर उलझाने या ये कहें कि अपने पक्ष को सही ठहराने के लिए इतिहास को ही गढ़ने बदलने, बिगाड़ने-संवारने की होती है कश्मीर जैसा इलाका इस खेल से कैसे बचा रह सकता है जहाँ का वर्तमान भयावह राजनीतिक-सामाजिक- सांस्कृतिक अंतर्द्वड से भरा हुआ है|
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जम्मू कश्मीर और समाज की धारणा:-
कश्मीरी समाज को एक उदाहरण से समझा जा सकता है इसमें अल्लामा इकबाल का उदाहरण सबसे महत्वपूर्ण है, इकवाल की जड़ें कश्मीरी पंडितों के उसी सप्रू परिवार से जुड़ी थी जिससे सर तेज बहादुर स्यू थे| (जन्म 20 जनवरी 1949, प्रसिद्ध वकील, राजनेता और समाज सुधारक थे)
अपनी इस विरासत को लेकर उनमें एक स्वाभाविक गुरूर था लेकिन वही इक़बाल कश्मीरी मुसलमानों की दुर्दशा को लेकर बार-बार व्यथित ही नहीं होते बल्कि 1931 के एक आन्दोलन में कश्मीरी मुसलमानों के प्रति डोगरा राज ( स्थापना महाराजा गुलाब सिंह ,वर्ष 1819 ) के अत्याचार का जबर्दस्त प्रतिकार भी करते हैं और कश्मीरी पंडितों का एक हिस्सा उन्हें खलनायक की तरह देखता है।
इस अन्तर्विरोध को समझने का दूसरा रास्ता कश्मीर के जन्म के अलग-अलग मिथकीय आख्यानों से गुजरता है, जम्मू कश्मीर को जानने और समझने से पहले यहाँ की पुराण कथाएं जानना बहुत आवश्यक है |
जम्मू कश्मीर नाम का उदय और पुराण कथाएं:
जब रिसर्च करते है तब बहुत सी कथाएँ मिलती है जिनमे से कल्हण की कथा का बहुत महत्त्व है कल्हण (1150 ई में कश्मीर के महाराज हर्षदेव के महामात्य चंपक के पुत्र और संगीतमर्मज्ञ कनक के अग्रज थे) ने राजतरंगिणी में भी इसी को आधार बनाया है। इसके अनुसार कल्प के आरम्भ से छ: मन्वन्तरों तक वहाँ सतीसर नामक विशाल झीलहुआ करती थी जिसमें “जलोद्भव” नामक एक राक्षस रहता था
जिसने झील के रक्षक नागों को आतंकित किया हुआ था। ब्रह्मा के पौत्र और मारीच के पुत्र कश्यप ऋषि जब हिमालय की तीर्थयात्रा पर आए तो नागों के प्रमुख नील ने उनसे (जो उसके पिता भी थे) जलोद्भव के अत्याचारों से मुक्त कराने की प्रार्थना की, जम्मू कश्मीर को अच्छे से समझने के लिए यहाँ की पुराण कथाओं को जानना और समझना बहुत जरुरी है
जम्मू कश्मीर की पहली पुराण कथा:-
यह पुराण कथा कश्यप ऋषि और जलोद्भव के बारे में है , कश्यप ऋषि ने झील को घेर लिया लेकिन जलोद्भव को ब्रह्मा से यह वरदान प्राप्त था कि जब तक वह पानी में है, उसे कोई मार नहीं सकता। तो विष्णु ने सहायता के लिए अनन्त को बुलाया जिसने झील के चारों ओर स्थित पहाड़ में छेद कर दिया
और जब झील के चारों ओर सतीसर का सारा पानी बह गया तो भगवन विष्णु ने अपने चक्र से जलोद्भव का गला काट दिया।
यह कहानी अपने आप में बहुत समझने योग्य है जब ऋषि कश्यप ने नागों से इस धरती पर मनुष्यों को भी साथ रहने की अनुमति देने के लिए कहा लेकिन नागों ने मनु के पुत्र मानवों को यहाँ रहने की अनुमति देने से साफ़ इनकार कर दिया था
इसके बाद क्रोधित ऋषि ने उन नागों को पिशाचों के साथ रहने का श्राप दिया। नील के क्षमा माँगने पर उन्होंने अपना श्राप कम कर दिया और कहा कि हर साल छः महीने के लिए पिशाच बालू के समुद्र में चले जाएँगे और इस अवधि में मानव वहाँ रहेंगे।
बाद में भगवन विष्णु ने यह आशीर्वाद दिया कि घाटी में पिशाचों का निवास केवल चार युगों तक ही चलेगा। चार युग बीतने के बाद जब सभी मानव छः महीने के लिए बाहर गए तो एक ब्राह्मण चंद्रदेव उनके साथ नहीं गया। उसने पिशाचों के अत्याचार की शिकायत राजा नील से की और कहा कि मानवों को वहाँ विस्थापन के भय से मुक्त होकर रहने की अनुमति दी जाए।
राजा नील ने यह प्रार्थना मानते हुए शर्त रखी कि उन्हें केशव द्वारा दिये सभी निर्देश मानने पड़ेंगे। अगले छः महीने चंद्रदेव नील के साथ महल में रहा और उसने नील से सभी रीति-रिवाज सीखे।
जब चैत्र में मान लौटे तो उसने मानवों के राजा वीरोदय को पूरी घटना बताई जिसे फिर नील ने सभी रीति-रिवाज सिखाये जिनमें से कुछ वैदिक रीति-रिवाजों के अनुरूप थे और कुछ कश्मीर के लिए अलग से। नीलमत पुराण नील द्वारा दी गई यही शिक्षाएँ और उसके द्वारा सुनाया गया ‘इतिहास’ है। इस किस्से का एक रूप दुर्गा के एक अवतार देवी शारिका के ‘माहात्म्य’ में आता है
जहाँ जलोद्भव के अत्याचारों से पीड़ित देवता शिव की पत्नी माता सती से प्रार्थना करते हैं। उनकी पुकार सुनकर माता सती एक पक्षी का वेश धारण करके आती हैं और अपनी चोंच से एक पत्थर वहाँ गिरा देती हैं जहाँ राक्षस रहते हैं। वह पत्थर एक विशाल पर्वत में तब्दील हो जाता है जिससे दबकर राक्षस की मृत्यु हो जाती है।
इसको हरी पर्वत के नाम से जाना जाता है, इसके शिखर पर उत्तर-पश्चिमी दिशा में देवी शारिका का प्रसिद्ध मन्दिर है जो हजारों वर्षों तक रहा और पुराणों में देखा गया तथा एक विशाल पाषाण स्तम्भ है जिस पर श्रीचक्रका चिन्ह बना हुआ था ।
इसको हम पुराण कथा कहने या कहानी , यह अपनी सोच पर निर्भर करता है ,इस कहानी के लेखक बेदिया-उद-दीन हैं। विल्सन उन्हें शेख नूरुद्दीन मानते हैं। इस कहानी के अनुसार आदम सरनदीप कश्मीर आया और उसने अगले लगभग 1110 वर्षों तक कश्मीर में मुसलमानों का शासन रहा।
जम्मू कश्मीर की दूसरी पुराण कथा:-
उसके बाद हरिनंद राजा के द्वारा उनका अंत किया गया जब मुस्लिम शासक को हराने के साथ हुआ जिसके वंशजों ने प्रलय तक राज्य किया। पानी घटने के बाद वहाँ तुर्किस्तान के एक क़बीले ने राज किया जिसके हजरत मूसा ने वहाँ के निवासियों को एक ईश्वर की आराधना करनी सिखाई।
इस मान्यता के अनुसार, हजरत मूसा की मृत्यु कश्मीर में हुई थी और उनकी क़ब्र अब भी कश्मीर में हैं। इस किस्से में झील को सुखाने का उपक्रम करनेवाला कश्यप नहीं अपितु काशेफ या काशेब नामक एक मुस्लिम जिन था जो सुलेमान का गुलाम था सुलेमान के कहने पर उसने बारामुला के पहाड़ों से पानी के निकलने की राह बना दी। नीलमत पुराण जहाँ पानी के निकलने का कोई स्पष्ट मार्ग नहीं बताता, वहीं इस कथा में बारामूला के पहाड़ का जिक्र है।
जम्मू कश्मीर की तीसरी पुराण कथा:-
तीसरी कथा प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग सुनाते हैं। इनके अनुसार, कश्मीर मूलतः एक झील थी जिसमें नाग रहते थे। जब बुद्ध उदयन के कुटिल नाग को वश में करके हवाई मार्ग से (उड़ते हुए) मध्य भारत की तरफ़ जा रहे थे तो कश्मीर के ऊपर से उड़ते हुए उन्होंने अपने शिष्य आनंद से कहा कि ‘मेरी मृत्यु के बाद एक अर्हत मध्यान्तिक यहाँ लोगों को बसाकर एक देश की स्थापना करेगा और फिर इस इलाके में बौद्ध धर्म का प्रसार करेगा।
बुद्ध की मृत्यु के 50 वर्ष बाद आनंद के शिष्य मध्यान्तिक ने यह बात सुनी और प्रसन्न हुआ तब तक वह अर्हत हो चुका था। उनके (बुद्ध ) के कहे अनुसार वह कश्मीर गया और वहाँ एक जंगल में अपनी पीठ बना ली। उसके चमत्कारों से प्रभावित होकर नागप्रमुख ने उससे उसकी इच्छा पूछी। मध्यान्तिक ने झील में अपने घुटनों भर जगह मांगी, अर्थात इतनी सूखी उन्हें जिसमें वह समाधि लगा सके।
नाग ने उसकी इच्छा मान ली। मध्यान्तिक ने चमत्कार से अपनी देह विशाल कर ली और नाग ने झील का पूरा पानी सुखा दिया। उसके बाद नाग और उसके परिवार को उसने पुरानी झील के उत्तर-पश्चिम में एक छोटी झोल में बसा दिया। नाग ने मध्यान्तिक से यहाँ सदा-सर्वदा रहने की प्रार्थना की लेकिन मध्यान्तिक ने कहा कि यह असम्भव है क्योंकि उसे जल्द ही परिनिर्वाण प्राप्त करना है।
नाग की अभ्यर्थना पर मध्यान्तिक ने कहा कि ‘जब तक यह देश बौद्ध धर्म के असर में रहेगा, यहाँ 500 अर्हत रहेंगे और जब यहाँ बौद्ध धर्म का असर ख़त्म हो जाएगा, यह इलाक़ा फिर से झील बन जाएगा।
इसके बाद उसने अपनी चमत्कारी शक्ति से 500 बौद्ध मठ बना दिये और फिर अपने लोगों की सेवा के लिए विदेशों से गुलाम ले आया। उसके जाने के कुछ समय बाद उन गुलामों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया लेकिन आसपास के राज्य के लोग उन्हें कोई सम्मान नहीं देते और उन्हें ख़रीदा हुआ कहते हैं।
कश्मीर का इतिहास और उसके अनेक पाठ-कुपाठ इन्हीं अंतर्विरोधों से संचालित हैं। मज़ेदार है कि जहाँ पहली कहानी अक्सर उद्धृत की जाती है, वाक़ी दोनों कहानियों का कहीं उल्लेख नहीं होता। आप देखें तो तीनों कहानियाँ अपने-अपने धार्मिक में कश्मीर की उत्पति को ढालने की कोशिशें हैं।
जम्मू कश्मीर में नाग और पिशाचों के बाद हिन्दुओं का प्रवेश
आप देखेंगे कि पहली कहानी में कश्मीर में मूल निवासी नाग और पिशाचों की जगह वैदिक हिन्दुओं के प्रवेश और फिर वहाँ उनके वर्चस्व के स्पष्ट इशारे हैं। जाहिर है कि यह कथा वैदिक वर्चस्व स्थापित होने के दौर में लिखी गई होगी और ऐसे ही बाकी दोनों कथाएँ बौद्ध और इस्लामी वर्चस्व के दौरान हुयी होगी
हालांकि इन कथाओं में लिखी बातें पूरी तरफ से सच है या नहीं इसके बारे में सत्यता से जाँच नहीं की जा सकती जो विज्ञान के सहारे ही लिखा जा सकता है, इस लेख का रिसर्च अलग – अलग दस्तावेज और किताबों से लिया गया है ताकि जो पाठक इतिहास को अच्छे से समझना और पढना चाहता है उसके लिए यह लेख बहुत महत्वपूर्ण है
किताबों और वेड पुराणों के अध्यन से यह पता चला है कि
कलयुग में 4 लाख 32 हजार वर्ष, द्वापर में इसके दोगुने त्रेता में इसके तीन गुनेऔर सतयुग में इसके चार गुना साल होते हैं। इस तरह एक चक्र में कुल मिलाकर लगभग 82 लाख बीस हजार वर्ष हुए। इसमें जलोद्भव के जन्म की कहानी भी मजेदार है। जब इन्द्र उस झील के किनारे क्रीड़ा कर रहे थे। तो संग्रह नामक दैत्य की नजर शची पर पड़ी और उसका वीर्यपात हो गया जो झील में गिर गया। इन्द्र और संग्रह में लगभग साल भर युद्ध चला जिसमें संग्रह मारा गया और उसके वीर्य से ही झील में एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम जलोद्भव रखा गया था कहते है उसका लालन-पालन नागों ने ही किया था
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FAQ
इनके अनुसार, कश्मीर मूलतः एक झील थी इसमें नाग रहते थे। जब बुद्ध उदयन के कुटिल नाग को वश में करके हवाई मार्ग से (उड़ते हुए) मध्य भारत की तरफ़ जा रहे थे तो कश्मीर के ऊपर से उड़ते हुए उन्होंने अपने शिष्य आनंद से कहा कि ‘मेरी मृत्यु के बाद एक अर्हत मध्यान्तिक यहाँ लोगों को बसाकर एक देश की स्थापना करेगा