वर्तमान में संथाल झारखण्ड के अलग-अलग जिलों (संथाल परगना, धनबाद, रामगढ़, हजारीबाग और सिंहभूमि) का क्षेत्र माना जाता है, लेकिन इनके इतिहास को देखें तो इनका मूलनिवास पश्चिम बंगाल के मिदनापुर का साओत (Saot) हुआ करता था, जिसको साओत्तर कहा जाता था उसी से संथाल कहलाये।
संथाल आदिवासियों का इतिहास
कुछ वर्षों में धीरे- धीरे इनका प्रवास/ स्थानांतरण कोडरमा के चाई चंपारण में हुआ। सन 1351 से 1388 के दौरान फिरोजशाह तुगलक दिल्ली का शासन बनता है, इसी दौरान बंगाल के रास्ते दिल्ली जाने वाले रास्तों पर लूटपाट होती थी। यह बात फिरोजशाह तुगलक को चलने के बाद उसने अपने सबसे बफादार सैनिक (सेनापति) मालिक बया/ इब्राहिम अली को भेजकर आक्रमण कराया। इस तरह से संथालो के इतिहास का उदय हुआ।
15वीं सदी में इनका इतिहास भारत के अनेक प्रदेशों झारखण्ड, छतीसगढ़, बिहार मिजोरम और मध्यप्रदेश जैसे प्रदेशों से मिलता है एक समय था जब यह लोग नदियों, जंगलो में रहा करते थे, धीरे -धीरे इन्होंने जंगलो को काटकर कृषि करना शुरू किया लेकिन यह बहुत कम जानते है आदिवासियों के गांव/घर कैसे होते है तथा किस मिट्टी के बनाये जाते हैं।

संथाल आदिवासी के घर जंगलो में
पूर्वाग्रह से ऐसा माना जाता है इनको जंगलो, पहाड़ों से बहुत लगाव है, जंगल के पेड़ो की पूजा करना, भारतीय सांस्कृति (सरहुल)का नया वर्ष मनाना और खेतोँ में अच्छी फसल के लिए जंगल देवता को बलि देना आपका कर्तव्य मानते हैं। आज भी देखा जाता है आदिवासी समुदाय के लोग जंगलो में रहकर आपना गुजर-बसर करते है।
डोमट मिट्टो में रेत और गाद मिलाकर घरों का निर्माण
इनके घरों का निर्माण बहुत छोटे आकर का होता है, जिसको डोमट मिट्टो (एक तरह की चिकनी मिट्टी) से बनता है उसके ऊपर छत बनाते हैं जिसको “पड़का” कहते हैं यह एक प्रकार की ईंट होती हैं जिससे आदिवासी अपने घरों की छत बनाते है। आम ईंटो की तुलना में यह बहुत पतली और लम्बी होती है, बारिस के पानी का धलाव जमीन की तरफ होता है ताकि घरों के अंदर बारिस से बचाव हो सके।
घरों (मकानों की बनावट):-
ज्यादातर घर मिट्टी के बने होते हैं जिसको चारो तरफ से मोटी दीवार की तरह इकखट्टा करके ऊँचा खड़ा करते हैं उसके ऊपर से छत को बनाते हैं यह छत धलान की तरह दिखाई देती है। बारिस के समय पानी का बहाव नीचे की तरफ आ जाता है। ज्यादातर घर डोमाह मिट्टी के बने होते हैं इसमें हरे कलर का रंग मिला होता हैं जिससे दीवारे अच्छी दिखाई दें।
घर के दरबाजों की बनावट:-
मासु (बांस की लड़की बना हुआ) दरबाजा जिसे घर के बहार लगते हैं। यहाँ चित्रों को दर्शाया गया है इसको बांस की लड़कियों से काटकर छोटे- छोटे टुकड़ो से बनाया जाता है जिसको रस्सी से इस प्रकार बांध के रखते हैं ताकि एक लाइन में बराबर प्रकार बंध सके और दरबाजा बंद करते समय आसानी से बंद हो जाये।

आदिवासी बताते हैं सुबह जंगलों में भेड़, बकरी, गाय और जंगली पशुओं को लेकर निकाल जाते हैं क्योंकि हमारे पास रोजगार नहीं है इन्ही पशुओं से उनका गुजारा होता है।
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FAQ
यदि भारत के इतिहास को देखे तो इनका उदय 13वीं शताब्दी में हुआ जब दिल्ली सल्तनत पर फिरोजशाह तुगलक दिल्ली का शासन हुआ करता था। उस समय सांथल आदिवासी बंगाल के मिदनापुर में निवास करते थे। 15वीं सदी में भारत के विभिन्न हिस्सों में चले गये।
विवाह के दौरान जब कोई आदिवासी लड़का, आदिवासी लड़की को धन/सोना/चांदी देता है उसे पोन (pon)कहते हैं।
संथाल आदिवासियों में धर्मिक प्रधान (Religion Head) को नायके कहा जाता है।
बिटलाहा, जिसे सामाजिक बहिष्कार कहते हैं यह सबसे कठोर दंड माना जाता है।
12 गोत्र होते हैं, शादी के दौरान गोत्रों का मिलान होता है ऐसा कहा जाता है कि समान गोत्र हाई तो शादी अशुभ मानी जाती है।
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