आपने किसी न किसी किताब में जल, जंगल, जमीन के बारे में पढ़ा ही होगा लेकिन ज्यादातर किताबों में इस तरह के लेखों को विस्तृत तरीके से नहीं दर्शाया गया है और न ही किसी टीचर, रिसर्चर के द्वारा लिखा गया है क्योंकि इस तरह का लेख लिखने में बहुत रिसर्च की जरुरत होती है इस लेख में जनसंगठक बिरसा राजनीतिक आन्दोलन की बारे में चर्चा करेंगे और यह समझने की कोशिस करेंगे एक आम क्रांतिकारी से भगवान का दर्जा कैसे मिला|
1895 में आन्दोलन की शुरुआत विशेष सी और धार्मिक रंग लिए हुए उसी मे धीरे-धीरे भूमि सम्बन्धी राजनीतिक आन्दोलन का स्वरूप ले लिया। इस परिवर्तन के पीछे सरदारों का बढ़ता प्रभाव काम कर रहा था।
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बिरसा मुण्डा भूमि सम्बन्धी आंदोलन कैसे बना राजनीतिक आन्दोलन:-
इन सरदा में प्रमुख थे पलकद के सोई किलो के मंगा मुण्डा और जौन मुण्डा, कसमार का जीन मुण्डा और नारंग का मार्टिल मुण्डा एक और सरदार वीर सिंह भी इस आन्दोलन से अपना गुप्त प्रयोजन साधना चाहता था। यह स्मरणीय है कि वीर सिंह ने बिरसा के पिता को शरण दी थी, वह इस आशा में था कि अगर बिरसा का आन्दोलन अंग्रेजों के विरुद्ध एक सफल सशस्त्र विद्रोह हुआ तो वह इसमें अपना प्रयोजन साध लेगा। इस तरह आन्दोलन का स्वरूप हो बदल गया।
हॉफमैन ने इस सम्बन्ध में अपना अनुभव बतलाते हुए कहा है-:
“मुझे ठीक-ठीक याद है कि किस तरह जाने-माने सरदार साधारण जनता पर बिरसा भगवान के यहाँ तीर्थयात्रा करने के लिए जाने पर जोर देते थे। पहले तो मैंने इसे अर्द्ध-जंगली मूर्खता समझ कर हफ्तों तक इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। पर मैंने जल्द ही देखा कि सभी जगहों से लोग बहुत बड़ी संख्या में चलकद चले आ रहे हैं तो सरदारों की गतिविधि पर मुझे संदेह हुआ। इस तरह की अफवाहें जान-बूझ कर बड़े प्रयास के साथ फैलाई जा रही थीं कि बिरसा बीमारों को आश्चर्यजनक ढंग से चंगा कर देता है और मुद्दों को जिला देता है मुंडाओं की भीड़ खास कर वे जो सरदारों के जाने-माने गाँव के थे, बराबर हथियारों से लैस बिरसा के पास पहुँचती थी।
मुझे यह निश्चित खबर मिली कि ज्यों-ज्यों, अनेक दिनों के रसद पानी के साथ आए हुए सशस्त्त्र लोगों की भीड़ चलकद में जमने लगी, उस जगह अन्ध श्रद्धालु का रंग फीका पड़ने लगा और उस आन्दोलन के सच्चे देशभक्तों का लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा साफ तौर पर उभर कर सामने आने लगा।
राजनीतिक आन्दोलन आरंभ:-
(अगस्त-नवम्बर, 1895 ) – सवाल यह था कि बिरसा और उसके आन्दोलन को सरदारों ने किस हद तक प्रभावित किया? यह तो संभव नहीं कि विरसा को चमत्कारी स्थिति से सरदारों का कुछ भी लेना-देना था। वे लोग तो इस आन्दोलन में तब आए जब देखा कि बिरसा के प्रति ज्यादा से ज्यादा लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है। उन्होंने अपने निजी स्वार्थ के वशीभूत होकर महसूस किया कि बिरसा के व्यक्तित्व और लोकप्रियता से उनके लड़खड़ाते स्वतंत्रता आन्दोलन को सुदृढ़ आधार मिलेगा।
उन्होंने बिरसा के यहाँ विशाल भीड़ इकट्ठा करने में सहयोग और प्रोत्साहन दिया और अपने विचार सामने लाने में विरसा के मंच से फायदा उठाया। यही नहीं, उन लोगों ने बिरसा के शिष्यों की जमात में भी सम्पर्क शुरू कर दिया। इसलिए अफसरों के अनुसार बिरसा का आन्दोलन केवल उसकी पुरानी चाल (सरदार आन्दोलन) में एक दुःसाहसिक कदम था।
सरदार आन्दोलन की गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला उपर्युक्त विवरण स्पष्टतः एपक्षीय है। बिरसा पर यद्यपि सरदारों का प्रभाव था पर निश्चय ही वह उनका प्रवक्ता न था। यह भी सही है कि सरदार आन्दोलन और बिरसा आन्दोलन दोनों की ही जड़ में भूमि सम्बन्धी पृष्ठभूमि अथवा कारण थी।
क्रांतिकारी विरसा मुण्डा का उद्देश्य :-
बिरसा का उद्देश्य अपने को मुण्डा राज का प्रधान बनाना था। साथ ही वह धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता भी हासिल करना चाहता था। जब सरदारों ने देखा कि उनके आन्दोलन को सफल होने की संभावना नहीं थी तो उन्होंने डूबते को तिनके के सहारे के रूप में विरसा आन्दोलन के साथ अपने को जोड़ दिया और वे बिरसा की योजना के अनुसार काम करने लगे। उदाहरण के लिए यह विचार कि बिरसा के नेतृत्व में लोग उठ खड़े होंगे, सभी विदेशियों को मार भगाएंगे या मौत के घाट उतार देंगे और मुण्डा राज कायम करेंगे, कोई भी सरकार का हुक्म न मानेगा बल्कि बिरसा का ही आदेश माना जाएगा। दूसरी बात यह कि मालगुजारी किसी भी रूप में नबिरसा मुण्डा +48 दी जाएगी और जमीन पर भी सभी लगान माफ समझा जाएगा। यह खास तौर पर सरदार आन्दोलन की मांग थी।
सरदार मुण्डाओं में जो धन-जन-बल सम्पन्न हुआ करते थे, उन्हें ही सरदार कहा जाता था। उनका आन्दोलन अर्थात् मुण्डाओं का आन्दोलन। सरदार आन्दोलन के प्रभाव से बिरसा के उपदेशों का स्वर भी बदल गया। वह अब मुण्डाओं के अलावा और किसी गया, को भी प्रोत्साहन देने को तैयार नहीं था। अपनी एक सभा में उसने अपनी जाति के शोषकों के विरुद्ध आवाज उठाई, गुस्से से आग बबूला हो पर उन्हें डाँटने-फटकारने लगा और अपने हाथ-पाँव पटकने लगा। लोग यह दृश्य देख कर डर गए। फिर उसने बतलाया कि उसका गुस्सा जमींदारों है और लोग जिस तरह जमींदारों को बाबू कहते हैं, उसे बाबू कह कर न पुकारें।
लेकिन जयचंदों की कमी कभी भी इस धरा पर नहीं हुई है-विदेशी सरकार के पिट्टू बनने का सपना संजोए बिरसा के उपदेश, बिरसा का उपदेशक के रूप में कार्य-कलाप की रिपोर्ट सरकार के यहाँ भेजी गई। उदाहरण के रूप में तमाड़ के थानेदार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि मौजा कटवई तबील के एक मुण्डारी ने अपने बारे में घोषणा कर रखी है कि उसे भगवान ने भेजा है और वह तरह-तरह की बाजीगरी के तरकीबों से अपनी ओर बहुत बड़ी संख्या में अनुयायियों को आकर्षित करता है।
उसने लोगों को धान बोने से मना कर दिया है और कह रखा है कि उन लोगें द्वारा तकलीफ उठाए बिना, भगवान खुद सब फसलें उगा देगा। उसने पहाड़ की चोटी पर अपना घर बना रखा था जहाँ लोग रोज बड़ी संख्या में उसके दर्शन के लिए पहुँचते थे, और अपने साथ बकरों, वस्त्र आदि को भेंट के रूप में भी ले जाते थे।
सिंहभूम से भेजी गई एक रिपोर्ट में कहा गया कि चलकद का मुण्डारी जाति का एक सन्यासी जिसका नाम था:-
आस-पास के कोलों को प्रेरित करता फिरता था कि वे शुद्ध हिन्दू बनें. सभी निषिद्ध भोज-पदार्थों का सेवन बंद करें। वह आगे लोगों से कहता था कि पोराहाट का एक बड़ा हिन्दू राजा (स्वयं बिरसा) उन जंगलों को अपने अधिकार में लेने वाला था, जिन पर अब तक अंग्रेजों का अधिकार था और उन सभी कोलों को, जो कड़ाई से धर्म का पालन करेंगे, इन जंगलों में रहने की अनुमति मिलेगी।
मुण्डारी का यह प्रत्याशित राजा चक्रधरपुर थाने के तेवी गाँव की भी यात्रा करने वाला था और उसने सिंहभूम के कई गाँवों को नोटिस दिए थे जहाँ के कोल उसका उपदेश सुनने जाते थे। यह बात जल्द ही स्पष्ट हो गई कि वह वास्तव में बांगा या सन्यासी न था, पर विरसा मुण्डारी नामक एक इसाई था (लेकिन अब वह ईसाई न रह गया था)। उसने पहले जंगल के बकायों के विरुद्ध आन्दोलन का नेतृत्व किया था। उसके द्वारा हिन्दू सिद्धान्तों के उपदेश की बात शायद गलत थी।
ईसाई मिशनरियों ने उसके कार्यों के बारे में सरकार को खबर दे दी थी। सरकारी अधिकारी राजनीतिक कारणों से नहीं बल्कि भूमि आन्दोलन सम्बन्धी कारणों से उसके विरुद्ध कदम उठाने का विचार कर रहे थे। इस बात पर कि खेती-बाड़ी पर ध्यान न देकर जो लोग उस आदमी का दर्शन करने जाते थे। और उसके निकट रहते थे, डिप्टी कमिश्नर ने विचार किया। इसलिए उन्होंने उस आदमी को पकड़ लाने का आदेश दिया पर बिरसा प्रकट नहीं हुआ।
बिसरा मुण्डा के बारे में रिसर्च :-
उक्त सरकारी रिपोर्टों के अनुसार इस उपद्रव को खत्म करना जरूरी था, क्योंकि इसके जारी रखने का मतलब होता है कि जिले के उस भाग में सब चीजों की कमी हो जाती है। 6 अगस्त, 1895 की परेड के समय चौकीदारों ने तमाड़ के थानेदार को खबर दी कि बिरसा ने घोषणा की है कि सरकार खत्म हो गई है।
इस पर प्रधान कान्स्टेबल को चलकद जाने का आदेश दिया गया। वह 6 अगस्त को बिरसा के यहाँ आने वाली भीड़ की गतिविधि की जाँच के लिए रवाना हुआ और वहाँ 8 अगस्त, 1895 की रात को 9 बजे पहुँचा। उस समय अंधेरा था और पानी बरस रहा था और वह प्रधान कान्स्टेबल उस रात कुछ भी न कर सका। वह बिरसा के अनुयायिय द्वारा बनाई गई झोपड़ियों में से एक में ठहर गया। वैसी 50 या 60 झोपड़ि थीं जिनमें से 30 पूरी तरह तैयार हो चुकी थीं। उनमें एक हजार आदमी सकते थे। फिर जो घटनाएँ हुई उसका उस कान्स्टेबल ने इस प्रकार सज वर्णन किया है:-
छुड़ा अगले दिन 9 अगस्त की सुबह को मुख्यालय से आदेश आ गया जिस पर मैंने बरसा को गिरफ्तार कर लिया। बिरसा के पिता सुगना तथा चलकद एवं अन्य गांव के 50-60 अन्य लोगों ने मिलकर मुझसे बिरसा को लिया। उन सबों ने हमारे दो कान्स्टेबलों को भगा दिया। कान्स्टेबल उन सब का मुकाबला न कर सके और हमारी झोपड़ी में वापस आ गए। हम लोग पूरे दिन सलाह-मशविरा करते रहे कि बिरसा को कैसे गिरफ्तार करें |
11 तारीख को मैंने अपने साथ आए हुए सुका चौकीदार को पौलुस ईसाई प्रचारक को बुलाने के लिए कौचांग भेजा। पौलुस से इस सम्बंध में सहायता पाने की मुझे उम्मीद थी। 13 तारीख को पौलुस 20 आदमियों के साथ चलकंद आया।
बिरसा की गिरफ्तारी का पूरा इतिहास :-
मैंने उसे बतलाया कि मैं इस काम में सिर्फ उन लोगों का नैतिक समर्थन चाहता हूँ, बिरसा की लोकप्रियता को देखते हुए उन लोगों ने जवाब दिया कि उनके नैतिक समर्थन मात्र से बिरसा की गिरफ्तारी संभव नहीं है। बिरसा का एक-एक अनुयायी हमारे पचास-पचास आदमियों के बराबर है। इसलिए उसे गिरफ्तार करना असंभव है। फिर पौलुस ने कहा कि वह जा रहा है और इतने सारे लोगों को जुटा लाएगा जिनसे मुझे अपने काम में वास्तविक सहायता मिल सके। मैंने पौलुस की मदद के लिए उसके साथ ईसुफ खाँ कान्स्टेबल को भेजा।
14 अगस्त को सुबह 8 या 9 बजे पौलुस और ईसुफ खाँ कान्स्टेबल लौटे। वे अपने साथ 200 आदमी भी लेते आए. जिनमें महावत राजपूत, पठान और मुण्डा थे। उसी दिन उसी समय तमाड़ दो और सिपाही सुजादित और ईदान भी आ गए। तब मैंने प्रस्ताव रखा कि इन दो और सिपाहियों के साथ 200 आदमी जाएँ और बिरसा को गिरफ्तार कर लें।
पर उन 200 आदमियों अथवा उनके प्रवक्ता ने कहा कि वे लोग भगवान की गिरफ्तारी में तब तक किसी प्रकार का हिस्सा न लेंगे जब तक मारपीट या वैसी कोई और बात न हो जिसमें उनका हस्तक्षेप जरूरी हो। जाए। तब 200 आदमियों में से सभी झुंड बना कर बिरसा की तरफ चले गए और मुझे मदद देने के लिए पौलुस के साथ करीब 20 या 30 राजपूत से बच गए।
फिर भी हमने बिरसा को पकड़ने की कोशिश की पर उसके साथ अनुयायियों की भीड़ हम लोगों के मुकाबले कई गुना ज्यादा थी। फिर भी हमने डट कर कोशिश की पर बिरसा को घर से बाहर निकाल लाने में नाकामयाब रहे। हार कर हमें अपनी झोपड़ी में वापस आना पड़ा। यह स्थिति 18 अगस्त को 8 या 9 बजे सवेरे की थी। तब हमने पूरे हालत के बारे में तमाड़ के थानेदार साहब को रिपोर्ट भेज दी और उनका अगला हुक्म आने का इन्तजार करने लगा। फिर ऐसा हुआ कि 16 अगस्त को बिरसा, उसके दोवानों और आदमियों ने आकर हमारी झोपड़ी चारों ओर से घेर ली। बिरसा अपने आदमियों को आदेश दे रहा था कि हम लोगों को वहाँ से खदेड़ दिया जाए। बिरसा अपने घर की छत पर खड़ा था और अनुयायियों की भीड़ को सम्बोधित करते हुए कह रहा था-“बिल्कुल ही डरो मत, मेरा राज शुरू हो गया। सरकार का शासन खत्म हो गया है, उनकी बन्दूकें बेकाम हो जाएँगी।
तब तुम लोगों को डर किस बात का?” बिरसा और भी बातें कह रहा था, जैसे कि “ये लोग (सरकार के पुलिस आदि) मेरे राज को जोखिम पहुँचा रहे हैं, इन्हें मार भगाओ” आदि-आदि। बिरसा कुछ खास मंत्र भी पढ़ रहा था जो हम लोगों की समझ में नहीं आ रहा था। वह अपने उन अनुयायियों को प्रेरित कर रहा था जो हथियारों से लैस होकर हम लोगों की झोपड़ी को घेरे हुए थे। उस गिरोह के नेता (वीर सिंह मुण्डा नम्बर दो) ने मेरी गर्दन के पास तक भाला ले जाकर मुझे धमकी दी कि अगर मैं उस जगह से नहीं चला गया तो वह मुझे मार डालेगा। तब हम लोगों ने बिरसा की गिरफ्तारी की उम्मीद बिलकुल छोड़ दी और वहाँ से भाग चले।
हम लोगों के पीछे बिरसा के 800-900 अनुयायियों की भीड़ खदेड़ते हुए पीछा कर रही थी। हम लोग अत्यधिक भयभीत थे, चलकद से एक मील चल चुके तो हम लोगों ने देखा कि हम लोग जिस तीन खटिया पर सोए हुए थे भीड़ उसे भी साथ में ला रही है और उस खटिया को रास्ते की एक नदी में फेंक दिया किसी प्रकार जान बचाकर हम लोगों ने बिरसा के गाँव से 7 कोस की दूरी पर दूसरे गाँवों में रात व्यतीत की जो बीरबांकी के उत्तर-पूरब और चलक से 7 कोस पर है। उस गाँव से हम सीधे तमाड़ चले गए।
इतिहास के पन्ने :-
हम लोगों द्वारा उपयोग में लाए खाट को फेंकते हुए बिरसा अनुयायियों की भीड़ ने जोर से कहा कि ‘सरकार का राज खत्म हो गया और उसके नौकर मर गए इसलिए हम उनके बिस्तर नदी में फेंक रहे हैं। वे लोग घंटे बजा रहे थे और अनाज ओसाने के सूप जोर-जोर से हिला रहे थे। ऐसा वे न सिर्फ हमें अपमानित करने के लिए कर रहे थे बल्कि उनके विचार से ऐसा करना एक अशुभ चिह्न था। बिरसा लोगों को उपदेश देता था कि वे भूत-प्रेत की पूजा न करें और न किसी की बलि दें बल्कि केवल उनकी आज्ञा मानें। बिरसा ने अपने मकान के चारों ओर जो पुआल के गई सजा रखे थे उनके ही सहारे वह मकान की छत पर चढ़ा था।
पुलिस का विवरण एकतरफा और अतिरंजित था। इस सम्बन्ध में मुण्डाओं ने घटनाओं पर अपना विवरण पेश किया। उनके अनुसार बिरसा में पुलिस अधिकारी से कहा कि “मैं नए धर्म का उपदेश कर रहा हूँ। सरकार मुझे कैसे रोक सकती है?” इस पर पुलिस अधिकारी ने उसे चेतावनी दी कि वह बड़ी भीड़ इकट्ठा न किया करें। बिरसा ने जवाब में कहा कि जब लोग खुद इतनी बड़ी संख्या में उसे सुनने आते हैं तो वह क्या कर सकता है? पुलिस अधिकारी की ढिठाई से लोग क्रुद्ध और उत्तेजित हो गए। विरसा उसके साथ सज्जनता से पेश आया। पुलिस अधिकारी ने बिरसा को तिकड़म से पकड़ने के लिए उसे पालकी में सवार होकर चलने का प्रलोभन दिया, पर बिरसा इतना चतुर था कि उसे इस प्रकार के ओछे तिकड़म से नहीं पकड़ा जा सकता था।
तब पुलिस अधिकारी की बेइज्जती की गई और उसे वहाँ से खदेड़ दिया गया। बिरसा ने जब अपनी गिरफ्तारी की संभावना देखी तो उसने लोगों से कहा कि अगर वह गिरफ्तार किया गया तो उसका शरीर लकड़ी के कुंदे में बदल जाऐगा। वह खुद दो तीन दिनों के भीतर चलकद वापस आ जाएगा और लकड़ी का कुंदा उसकी जगह जेल में मिलेगा।
इस घटना सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्र में उत्तेजना फैल गई। सरकार ईसाई मिशनरियों और जमींदारों का तो समर्थन करती थी और लगान बढ़ता जा रहा था। इसलिए स्वभावतः जनसाधारण की भावनाएँ सरकार के खिलाफ थीं। बिरसा द्वारा जनमानस को इस स्थिति से लाभ उठाया जा रहा था। अंग्रेज अफसरों को जाँच के बदले शिकार खेलने से ही अवकाश नहीं मिलता था, दरोगा आता था, जाँच का दिखावा करता था और फिर खुलकर पैसा कमाता था।
सरकार की प्राप्त खबरों के अनुसार लोग न केवल सोती बाड़ी छोड़ जा रहे थे बल्कि अपने मेवशी भी बेच रहे थे। बिरसा का आन्दोलन निरन्तर बड़ता जा रहा था। उसका क्षेत्र विस्तृत होता जा रहा था। सोनपुर अब तक जिले का वैसा हिस्सा था जहाँ भूमि आन्दोलन की हथान पहुंची थी। वह सरदार आन्दोलन का एक प्रमुख केन्द्र था। वहाँ के लोग भी सिरसा के पास बड़ी संख्या में पहुँचने लगे।
प्रधान सिपाही की मदद के लिए पहुँचे थे, वे बिरसा के कोपभाजन हुए। वह सभी को अपने निकट बुलाने लगा जो अब तक उनके पास न आए थे, उनमें चाहे मुण्डा हो या मानकी। उसने कोचांग के उन राजपूतों को भी बुला भेजा जो उसे गिरफ्तार करने के लिए प्रधान सिपाही की बुलाहट पर आए थे। तब तक इस आन्दोलन को समाप्त करने हेतु अधिकाधिक अफवाह फैलाई गई। उदाहरणस्वरूप 24 या 27 अगस्त, 1895 की रात को सम्पूर्ण क्षेत्र से ईसाई मिशनरियों को समाप्त करने का षड्यंत्र किया गया था। हौफमेन ने इसका संकेत इस प्रकार दिया है-
स्वयं बिरसा और सरदार लोग धार्मिक क्रान्ति के शिकार थे या नहीं. यदि वे थे तो किस हद तक थे? धार्मिक क्रान्ति का निश्चित तौर पर यह फायदा तो था कि उस समूचे क्षेत्र में सरदारों की वे अनेक सभाएँ हानिरहित मालूम पड़ती थीं जिनमें प्रस्तावित विद्रोह के बारे में फैसले किए जाते थे। धार्मिक क्रांति की आड़ के कारण उन सभाओं के बारे में न सरकार को कोई शक होता था और न ही मिशनरियों को इसी कारण अगस्त, 1895 में चलकद में बिरसा के इर्द-गिर्द 6000 सशस्त्र व्यक्ति इकट्ठा हो सके। जो विरसा से जलते थे और अंग्रेजों की जो हजूरी किया करते थे। उन लोगों ने इतना अफवाह फैलाया कि इसकी तुलना कहीं से भी नहीं की जा सकती है।
उन लोगों ने अतिशयोक्तिपूर्ण और योजनाबद्ध ढंग से गलत खबरों को प्रचारित कराना शुरू किया कि बिरसा ने उसके अपने धर्म में विश्वास न रखने वालों की सामूहिक हत्या के लिए एक खास दिन तय किया है। बिरसा के अनुयायी अपने-अपने गाँव जाकर अपना शस्त्र लेकर बिल्कुल तैयार होकर नियत समय पर कत्लेआम शुरू करने के लिए लौटने वाले थे। समूचे क्षेत्र में यह भी आदेश प्रसारित कर दिया गया था कि 27 तारीख को चलकद में बिरसा के घर पहुँचे। विरसा के गुस्से का शिकार बंदगाँव का एक प्रभावशाली जमदार जो कांचांग का मुखिया था और दूसरा पेलिकन मिशन मुरहू का नेहमिया जिसे पूर्व में ही विरसा ने शाप दिया था। दिन कल्लेआम शुरू होता जिसमें पादरियों की अच्छी खबर ली जाती।
कोलों में भी इस तरह विद्रोह करने की योजना बनाई थी। कोलों को शिकायत थी कि उन लोगों के साथ न्याय नहीं किया गया है। उन लोगों का विश्वास था कि वे सरकार के खिलाफ विद्रोह करते हैं तो सरकार उनके प्रति न्याय को और सरकार पूर्व की भाँति उनके खोये राज्य को उन्हें वापस दिला देगी यह विचार कोलों का वैसा ही था जैसा कि 1890-92 से सरदारों का था ये सब सूचनाएँ बंदगाँव के जमींदार जगमोहन सिंह ने सरदारों और बिस के अनुयायियों के इरादे के बारे में सरकार के यहाँ बढ़ा-चढ़ा कर रिपोर्ट दी।
उनके अनुसार ये लोग न केवल साहब लोगों को मार डालना चाहते थे। बल्कि उन सयानों को भी खत्म कर देना चाहते थे जो विरसा भगवान को इज्जत न करते थे। यह सही था कि विरसा का अनुमोदन लेकर या उसके बिना अनुमोदन के ही सरदारों ने तैयारी शुरू कर दी थी और हथियार भी इकटठे करने प्रारम्भ कर दिए थे। यद्यपि 24 अगस्त, 1895 का विद्रोह छिड़ जाने की संभावना न थी पर शीघ्र ही छिड़ सकता था |
बिरसा मुण्डा की गिरफ़्तारी के बाद क्या होता है यह सब अगले ब्लॉग में लिखेंगे
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मंगा मुण्डा और जौन मुण्डा, जीन मुण्डा और नारंग का मार्टिल मुण्डा और सरदार वीर सिंह , यह सब बिरसा के साथी बताये जाते है|