देश की अर्थ व्यवस्था में भारत की कृषि क्षेत्र में उत्पादन का क्रांतिकारी परिवर्तन हरित क्रांति से माना जाता है भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर इसका प्रभाव बड़े पैमाने पर देखा गया और यह भी कहा जाता कि दुनिया के कई देश गरीबी से उपर उठ कर आये है इसीलिए वर्तमान में भी हरित क्रांति को कृषि उत्पादन का जनक कहा जाता है|
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हरित क्रांति (Green Revolution) :-
इसका प्रारंभिक समय 1943 से 1970 का दशक माना जाता है इसमें अनुसंसाधन, विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और भारत के साथ विश्व में कृषि की उपज में वृद्धि हुयी |

हरित क्रांति के जनक का नाम :-
नॉर्मन बोरलॉग को Green Revolution का वैश्विक स्तर पर जनक के रूप में जाना जाता है इन्होने अमरीका में कृषि क्षेत्र का कार्य 1943 से धीरे- धीरे शुरू कर दिया था, कुछ वर्षों के दौरान यह रेसलिंग किया करते थे, दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् कृषि अनुसन्धान में आगे बड़ाया, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है मैक्सिको में गेंहू के अध्यन के आधार पर कुछ ऐसे बोनी प्रजातियों को विकसति किया जिनको माना जाता था कि इसमें लागत बहुत कम है और उत्पादन बहुत ज्यादा, इसीलिए 1963 में नॉर्मन बोरलॉग पहलीबार भारत आये, इस तरह इनका पहला प्रयास बहुत सफल हुआ और गेंहू में वृद्धि बहुत तेजी से हुयी |
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हरित क्रांति का इतिहास :-
इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले 8 मार्च 1968 को एक भाषण में US एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसआईडी) के प्रशासक विलियम एस. गौड द्वारा किया गया था यह एक अमेरिकी थे |
भारत में हरित क्रांति :-
भारत के सन्दर्भ में इस क्रांति के लिए दो व्यक्तियों का योगदान सबसे अहम माना जाता है जिसमें नॉर्मन बोरलॉग और भारत के M.S Swaminathan, 1950 के दशक में उतरार्ध और 1960 के दशक के प्रारंभ में वह समय था जब दुनियां के कृषि वैज्ञानिक, नीति निर्माताओं के रूप में, ज्यादा उपज वाली फसल किस्मों को विकसित करने के प्रयासों में गंभीरता से लगे हुए थे |
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योगदान:-
भारत अपनी अधिकासं अनाज आवश्कताओं को आयत के माध्यम से पूरा कर रहा था, विशेष रूप से 1954 से सार्वजनिक कानून (पीएल- Public Law)-480 समझौतों के तहत US से गेंहू लिया करते थे उसके बाद खाध्य और कृषि मंत्री के रूप में सी सुब्रमणयम ने एम.एस. स्वामीनाथन, बी शिवरामन और नॉर्मन ई. बोरलॉग के साथ भारतीय हरित क्रांति के माध्यम से खाध्य उत्पादन में आत्मनिर्भरता की युग की शुरुआत हुयी |
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