भारत के ऐसा देश है जहाँ अनके प्रकार के धर्म, जातियां, समूह और जनजाति के लोग रहते है कोई इन्हें जनजाति के नाम से जनता है तो कोई इन्हें आदिवासी के नामों से जनता है इनमें से ज्यादातर जनजातियाँ जंगलों, नदी के किनारे या पहाड़ों में वसा करती थी/ है | मध्य प्रदेश के आंदोलनों को समझने के लिए यहाँ की जनजातियों के बारे में जानना और समझना अति आवश्यक है इसीलिए इस लेख में मध्य प्रदेश की कोरकू जनजाति के बारे में चर्चा करेंगे और एक निबंध/ रिसर्च के साथ लिखेंगे |
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कोरकू जनजाति का इतिहास :-
कोरकू आदिवासी मानते है कि रावन के अनुरोध पर महादेव जी ने चीटी की बांबी की मिट्टी में से स्त्री और पुरुष की आकृतियाँ बनाई और उन्हें ‘मुला’ और ‘मुलाई’ नाम दिया गया और दोनों को ‘पथरे’ कुल नाम दिया|
इन दोनों को कोरकू कुल जाति का पूर्वज माना जाता है तथा यह आदिवासी जाति मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के पश्चिमी हिस्से और महाराष्ट्र के मेलघाट में रहती है|
कोरकू नाम ‘कोरु’ यानि आदमी और ‘कु’ जो उसे बहुबचन बनाता है से बना हुआ है इस जनजाति की भाषा ‘आस्ट्रो- एशियाई’ है तथा प्राथमिक रूप से कोरकू खेतिहर जाति है|
मध्य प्रदेश की कोरकू जनजाति का निवास क्षेत्र :-
कोरकू:- मध्य प्रदेश राज्य के छिंदवाड़ा, बैतूल, होशंगाबाद, खंडवा और बुरहानपुर जिले में इस जाति का मुख्यता विवास स्थान माना जाता है, यह लोग वनोपज खेती, मज़बूरी पर निर्भर रहने वाले ज्यादातर जंगलों में रहना पसंद करते है|
इस जनजाति को तीन (3) भागों में विभाजित किया गया है ;-
- बावरिया:- बैतूल जिले के भैसदेही के आदिवासी कोरकू ‘बावरिया’ कहलाते है |
- रुमा:- अमरावती महाराष्ट्र के आदिवासी कोरकू ‘रुमा’ कहलाते है|
- बंदोरिया:- पचमढ़ी और चमौली क्षेत्र के रहने वाले कोरकू ‘बंदोरिया’ कहलाते है|
कोरकू के पूर्व व परम्परा का इतिहास :-
रिसर्च तथा इतिहास के लेखक बताते हैं कि हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले कोरकू होली, दीपावली, के साथ देवदशहरा,डोडवली, जिरौली तथा पाला आदि त्यौहारों को मनाते है |
आमने-सामने दो कतारों में बने दो कोरकू घरऔर उनके गेरू, खड़ियाव पीली मिटटी से सजे ओटल कोरकू घाणा को खास पहचान देते है| दीपावली की रात ठाठ्या यानी ग्वाले परिवार की स्त्रियाँ कोरकू घरों की दीवारों पर लाल मिटटी और खड़िया से गुदनियाँ नामक मांगलिक चित्र बनाती है|
इसके साथ- साथ ठाठ्या पुरुष रात भर भुगडू यानीलम्बी बांसुरी बजाते हुए घर- घर जाकर मृत्य नजर आते है| यह जनजाति मुंडा या कोलारियन जनजातीय समूह में आते है, कोरकू का शाब्दिक अर्थ है ‘मानव समूह, कोर- मानव, और कू-बहुवचन के लिए प्रयुक्त होता है|
कोरकू स्त्रियाँ गोदने के सौकीन होती है यह महिलायें माथे पर अंग्रेजी अक्षर के ऊपर- नीचे दो(2) को कपार गोडई कहते है तथा ठोड़ी, नाक, और कान पर भी बिन्दु गुदवाये नजर आते है और हाथों पर चैक, रानी गोडईआदि के आकार देखने को मिलते है |
महत्वपूर्ण बिंदु :-
यह आदिवासी समुदाय, गोदने के आकारों के बिन्दु अक्सर अन्न का या अग्नि का दयोतक होता है यहन गोदने शारीर का श्रृंगार भी है, उसे रोग मुक्त व बलशाली बनाने का उपाय भी होता है और इन्हें घर में अन्न रहे, इसकी चिंता की इबारत की तरफ भी पढ़ा जा सकता है| कोरकू समुदाय अपने मृतकों को पितर और देवता की तरह मानते है इनमें लकड़ी के मृतक स्तंभ बनाने का चलन है, जिसे मुण्डा कहते है| मुण्डा बनाने व लगाये जाने के अनुष्ठान को सिंडौली कहते है |
तिन- चार दिनों तक चलने वाला यह अनुष्ठान पूस माह में किया जाता है, निश्चित दिन जो प्रायःका दिन ही होता है , परिवार के लोग जंगल में किसी साबुत यानी अक्षत सागौन के पेड़ पर अपने पूर्वजों सोमा-डोमा का नाम लेकर मौली बांधते है| पूजा के बाद ही मुण्डा बनाने के लिए पेड़ को काटा जाता है, मुण्डा या मृतक स्तंभ (जिसकी मौत हो गयी हो) परिवार के एक या एक से अधिक मृतकों के लिए बनवाया जाता है और इस पर चाँद- सूरज, घुड़सवार, खुले हाथों वाली मनुष्या कृति के आलावा मृतक की प्रिय वस्तुओं को आँका जाता है|
कोरकू जनजाति की विवाह परम्परा :-
कोरकूओं का विवाह चार पद्यतियों में प्रचलित है |
- लगझमा या घर दामाद
- चिथोड़ा
- राजी- बाजी
- विधवा व तलाक विवाह
इन जनजातियों की उत्त्पति पठारी क्षेत्र से होती है|इस तरह से भारत देश में अनेकों जातियां है जो विलुप्ति की तरफ बढ़ती हुयी दिखाई दे रही है चाहे झारखण्ड की पहाड़ी जनजाति हो या फिर बिहार की जनजातियाँ |
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FAQ
चार पद्यतियों में प्रचलित है जोकि निम्नलिखित है :-
1- लगझमा या घर दामाद
2- चिथोड़ा
3- राजी- बाजी
4- विधवा व तलाक विवाह
कोरकू जनजाति में
कोरकू समुदाय / कोरकू जनजाति
इसका शाब्दिक अर्थ ‘मानव समूह, कोर- मानव, और कू-बहुवचन के लिए प्रयुक्त होता है|
हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले यह जनजाति होली, दीपावली, के साथ देवदशहरा,डोडवली, जिरौली तथा पाला आदि त्यौहारों को मनाते है |
खेतिहर
‘मुला’ और ‘मुलाई’ नाम और दोनों को कोरकू जनजाति का पूर्वज माना गया है |
यह आदिवासी जनजाति मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के पश्चिमी हिस्से में रहती है |