हिंदुस्तान की आजादी से पहले बहुत से प्रान्त हुआ करते थे, जैसे मध्यप्रान्त, उत्तर प्रान्त, बंगाल प्रान्त, उड़ीसा प्रान्त तथा इसके साथ- साथ यहाँ की भाषाएँ (बोलियाँ) भी अलग थी लेकिन वर्तमान में यह भाषाओँ और बोलियाँ विलुप्त होती जा रही हैं | इसके अनेक कारण है उनके से मुख्य कारण अंग्रेजी भाषा है लेकिन जब सिविल सर्विस की परीक्षाएं होती है तो अक्सर मध्यप्रान्त (वर्तमान का मध्य प्रदेश) से इन बोलियों पर कुछ न कुछ सवाल पूछा जाता है इसलिए इस लेख में मध्यप्रदेश की बोलियाँ के बारे में जानेंगे |
मध्यप्रदेश की बोलियाँ:-
कहते है कि भारत देश में मध्य प्रदेश एक ऐसा प्रमुख राज्य है जो भाषाओं और बोलियों के क्षेत्र में बहुत धनी माना कहा जाता है, बुन्देली, बघेली, मालवी इमानी भाषाएँ प्रमुख है| यह एक भाषी राज्य है यहाँ हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी और मुद्रित की जाती है| यहां हिंदी के अतरिक्त सिन्धी, मराठी, गुजरती, उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी, उड़िया, मलयालम, तेलगु,तमिल इत्यादि भाषाओं का प्रभाव देखने को मिलता है|
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मध्यप्रदेश में बोली जाने वाली बोलियाँ:-
इस प्रदेश में समाजिक एवं सांस्कृतिक भिन्नता होने के कारण अनेक बोलियाँ बोली जाती है | बोली भाषायी विकास की द्रष्टि से प्रारम्भिक अवस्था में होती है जिसे लोकभाषा के रूप में जानी जाती है |
यहां बोली जाने वाली भाषाए निम्नलिखित है :-
- निमाड़ी
- मालवी
- बुंदेली
- बघेली
- कोरकू
- भीली
- गोंडी
- हल्बी
- भतरी
- -ब्रज
1- निमाड़ी बोली का इतिहास और चर्चा :-
यह बोली मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र खरगौल, खण्डवा, बडवानी , बुरहानपुर धार में विस्तृत है| इस बोली में मुख्यतः मालवी, मारवाड़ी, गुजरती एवं मराठी भाषाओँ का प्रभाव देखा जाता है | पश्चिमी हिंदी की बोली निमाड़ी का विकास सौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है|
जब इतिहास का रिसर्च करते है तब पता चलता है कि जार्ज ग्रियर्सन ने इसे दक्षिणी हिंदी कहा है, इस बोली में साहित्य-क्षेत्र के प्रसिद्ध साहित्य संगत सिंगाजी तथा निमाड़ी साहित्य का इतिहास पुस्तक डॉ. श्रीमान परिहार ने लिखी है |
डॉ. कृष्णलाल हंस ने निमाड़ी को पश्चिमी हिंदी की एक बोली माना है| निमाड़ी बोली के कुछ उपरूप भी है, जो वस्तु स्थानगत और जातिगत रूप हैइस द्रष्टि से मालवी बोली का मिश्रण, उत्तर पूर्व में बुंदेली का मिश्रण दक्षिणी सीमा परखंडी बोली का मिश्रण है |
अखिल निमाड़ लोक परिषद् का वार्षिक साहित्यिकार व कलाकार प्रतिवर्ष “ निमाड़ी दिवस के रूप में 19 सितंबर को मनाया जाता है |
2 – मालवी का इतिहास और उसकी चर्चा :-
मालवी बोली का विकास शौरसेनी अपभ्रंस से हुआ है, यह मूल रूप से मारवाड़ी से संबंधित है तथा डॉ.धीरेन्द्र शर्मा ने इसे दक्षिणी राजस्थानी कहा है| मुख्यतः मालवा क्षेत्र में बोले जाने के कारण इस बोली का नाम मालवी पड़ा |
मालवी बोली विशुद्ध रूप से धार, इंदौर, उज्जैन, देवास, रतलाम में बोली जाती है| इस बोली की सीमाएँ पश्चिम में प्रतापगड-रतलाम, दक्षिण- पश्चिम में इंदौर, दक्षिण-पूर्व में भोपाल होसंगाबाद का पश्चिम विभाग, उत्तरपूर्व में गुना,उत्तर पश्चिम में नीचम, और उत्तर की ओर से कोटा, झालावाड, टोंक और चित्तौड़गढ़ विस्तृत है |
3-बुंदेली बोली का इतिहास और उसकी चर्चा
बुंदेली प्रदेश के निवाड़ी, छतरपुर, टीकमगढ,सागर, दमोह, पत्रा, विदिशा, ग्वालियर, भिण्ड, दतिया, शिवपुरी,गुना, मुरैना, रायसेन, होसंगाबाद, नरसिंहपुर, जवापुर जिलों में विस्तृत है | इस बोली की उपबोलियाँ पंवारी, लौंधाली, खटोला है | हिंदी साहित्य की द्रष्टि से समर्द्ध बोली है तथा केशव, पद्धाकार कवि गंगा व्यास इत्यादि है |
भारतीय आर्य भाषा के अंतर्गत सौरसेनी अपभ्रंस से जन्मी हिंदी की एक प्रमुख बोली बुंदेली है इसका एक नाम बुंदेलीखंडी भी है यह नाम अंग्रेज अधिकारी तथा साहित्यकार जार्ज प्रियर्सन ने किया था | मध्य प्रदेश की अन्य बोलियों की तुलना में बुंदेली का क्षेत्र सवसे अधिक व्यापक है |
4-बघेली बोली का इतिहास और उसकी चर्चा :-
पूर्वी हिंदी की बघेली का विकास अर्धमागधी अपभ्रंस से हुआ है मध्य प्रदेश में बघेली बोली, रीवा, सिंगरौली, सीधी,शहडोल. सतना, उमरिया तथा अनुपपुर में बोली जाती है |
डॉ. श्रीनिवास शुक्ल ने बघेली शब्द्कोस का संकलन किया था तथा महाराजा विश्वनाथ सिंह की पर धर्म विजय और विश्वनाथ जैसी प्रसिद्ध रचनाये है | अर्धमागधी अपभ्रंश से जन्मे पूर्वी हिदी की एक महत्वपूर्ण बोली बघेली है , भाषाविदों ने इसे अवधी की एक बोली माना है तथा 12वीं शताब्दी में ब्याघ्रदेव ने बधेल राज्य की नीव रखी डाली थी इसलिए यह क्षेत्र बघेलखण्डऔर वहाँ बोली जाने वाली बोली का नामकरण बघेली हो गया |
यह बोली (बघेली भाषा) मध्य प्रदेश में रीवा, शहडोल, सतना, और सीधी, सिंगरौली, उमरिया अनूपपुर जिलों में बोली जाती है | मिश्रित रूप से यह कटनी जिला और उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के कुछ भागों में बोली जाती है | मंडला की जनजातीय बोली में बघेली, बुंदेली एवं मराठी का मिश्रण है |
5- कोरकू बोली का इतिहास और उसकी चर्चा :-
मध्यप्रदेश के बैतूल, होशंगाबाद ,छिंदवाड़ा, खरगौन, जिलों में निवास करने वाले कोरकू जनजाति के द्वारा कोरकू भाषा बोली जाती है, इस बोली में लोकगीतों, एवं लोककथाओं के रूप में फुटकर साहित्य रचा गया है |
कोरकू भारत के मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र राज्यों में बोली जाने वाली आस्ट्रो-एशियाई भाषा परिवार का मुण्डा शाखा की एक भाषा है| इसे कोरकू समुदाय के लोग बोलते है |
6-ब्रज भाषा(बोली) का इतिहास और उसकी चर्चा :-
भारतीय आर्य भाषाओँ की परम्परा में विकसित होने वाली “ब्रजभाषा” शोरसेनी अपभ्रश की कोख से निकली है यह एक सप्ताहिक एव स्वत्रंत भाषा है और इसकी अपनी कई बोलियाँ भी है |
भक्तिकाल में प्रसिद्ध महाकवि सूरदास से लेकर आधुनिक काल के विख्यात कवि श्री वियोगी हरि एक ब्रज भाषा में प्रबंध काब्य समय- समय पर रचे जाते रहे है |
डॉ धीरेन्द्र वर्मा “कन्नौजी” को ही ब्रज भाषा का ही एक रूप मानते है इसका विकास मुख्यता पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उससे लगते राजस्थान, मध्यप्रदेश व हरियाणा में हुआ है|
7-भीली बोली का इतिहास और उसकी चर्चा :-
भील भाषाएँ पश्चिमी हिन्द-आर्य भाषाओं का एक समूह है जिन्हें मध्य, पश्चिमी और कम संख्या में भारत के पूर्वी भाग में लगभग 60 लाख लोग इस भाषा को बोलते है|
इसे भीली, भिलाला और राजस्थान से वागड़ी भाषा के रूप में जाना जाता है , एनी आदिवासियों के समान अभिव्यक्ति के लिए भीलों के पास भी भी बोली तो है परन्तु लिपि नहीं है |
भील आदिवासियों का समस्त साहित्य सृजन मौखिक ही हुआ है |
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