यदि हिंदुस्तान को समझना है तो इतिहास को जानना बहुत जरुरी हो जाता है, हिंदुस्तान आजाद हुए वर्षों बीत गये है और आने वाले कुछ वर्षों में 100 वर्ष भही पूरे हो जायेंगे लेकिन ऐसा बहुत कम देखा गया है कि वर्तमान की युवाओं को इतिहास से कुछ लेना देना नहीं है, किसी-किसी राज्य में युवाओं की यह हालत है कि उनको हमारे देश को आजादी दिलाने वाले क्रांतिकारियों के बारे में पता तक नहीं है इसलिए आजा का लेख ऐसे ही क्रांतिकारी के ऊपर जिनके बारे में इतिहास और इतिहारकारों ने ज्यादा लिखना उचित नहीं समझा, उनका नाम क्रान्तिकारी पं. परमानन्द है |
इनके जीवन में बहुत उतार चड़ाव आये उनके बारे में इस लेख में चर्चा करेंगे |
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पं. परमानन्द का जीवन और शिक्षा :-
परमानन्द जी का जन्म 6 जून 1892 को ग्राम सिकरौधा, तहसील राठ, जिला हमीरपुर के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बाबू गयाप्रसाद खरे एवं माता का नाम सगुनाबाई था। छात्रावास में ही उनका परिचय पं. सुन्दरलाल, महामना मालवीय जी एवं पं. मोतीलाल नेहरू से हो गया था। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस उन्हें दादा जी कहकर बुलाते थे।
पं.परमानन्द और कांग्रेस इतिहास:-
1905-06 में कॉंग्रेस का खुला अधिवेशन चल रहा था। यहाँ जो प्रस्ताव पारित हुआ उसमें परमानन्द सहमत नहीं हुए और अपनी असहमति बीच सभा में खड़े होकर बेधड़क कह दी। इस अधिवेशन में सचीन्द्रनाथ सान्याल भी उपस्थित थे। वे परमानन्दजी की प्रतिभा को पहचान गए। उन्होंने परमानन्दजी को अपने दल अनुशीलन समिति में शामिल कर लिया।परमानन्दजी रास बिहारी बोस के भी अभिन्न मित्र थे।
जब रासबिहारी बोस ने दिल्ली में लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका तब परमानन्द जी को अत्यधिक प्रसन्नता हुई थी। उन्होंने रासबिहारी बोस को इसके लिए पीठ ठोककर शाबासी दी थी। अनुशीलन समिति के कहने पर परमानन्दजी अमेरिका गए एवं लाला हरदयाल की प्रेरणा से गदर पार्टी में शामिल हो गए। 1913 में गदर पार्टी के कहने पर अमेरिका से जापान गए। वहाँ से युद्ध के नक्शे लेने जर्मनी चले गए। सिंगापुर जाकर उन्होंने अपना ओजस्वी भाषण दिया एवं वहाँ यूनियन जेक उतारकर तिरंगा झण्डा फहराया।
परमानन्द जी पर धाराएँ और जेल जाने का इतिहास :-
1914 में तोसामारू जहाज़ द्वारा कलकत्ता बन्दरगाह पर उतरे। यहाँ उनकी तलाशी ली गई। गदर के नक्शों को वह बाल्टी में रखे जूतों में छिपाकर बच निकले। यहाँ से वे लाहौर व कपूरथला गए। यहाँ सचीन्द्रनाथ सान्याल एवं सरदार करतार सिंह की सशस्त्र क्रान्ति की योजना में शामिल हुए। इलाहाबाद, झाँसी एवं कानपुर में सशस्त्र क्रान्ति का दायित्व परमानन्दजी को सौंपा गया।
21 फरवरी 1915 को सशस्त्र क्रान्ति का दिन चुना गया। यह तय किया गया था कि अपने-अपने क्षेत्रों में गर्वनरों को पकड़कर, वहाँ लोकतान्त्रिक सरकार का गठन करें। 17 नवम्बर 1914 को कृपाल सिंह नामक देशद्रोही ने पुलिस को यह जानकारी दे दी। परमानन्दजी को मानचित्रों सहित गिरफ्तार कर लिया गया तथा परमानन्दजी पर मुकदमा चला।
13 सितम्बर 1915 को निर्णय सुनाया गया कि परमानन्द (झाँसी), तुमने देश-विदेशों में ब्रिटिश गवर्नमेण्ट को उखाड़ फेंकने के लिए षड्यन्त्र किया। बाहर देशों से हथियार लाए। सिंगापुर, झाँसी, कानपुर, इलाहाबाद की छावनियों में फ्रन्टियर की सरकारी फौजों में बगावत फैलाई और मसाला इकट्ठा किया इसलिए यह कोर्ट दफा 121, 122, 123 व 124 के तहत तुम्हें फाँसी की सजा देती है।16 नवम्बर का दिन फाँसी के लिए तय किया गया।
बाद में 14 नवम्बर को प्रवी काउंसिल के निर्देश पर परमानन्दजी की सजा काला पानी में तब्दील कर दी गई। अण्डमान में परमानन्दजी वीर सावरकर के साथ रहे।
जिंदगी का आखिरी सफ़र :-
परमानन्दजी के जेल जाने पर उनके शिष्य दीवान शत्रुघ्न सिंह ने पार्टी का कार्य आगे बढ़ाया। 13 अगस्त 1937 को परमानन्दजी रिहा होकर लाहौर पहुँचे। यहाँ उनका नागरिक अभिनन्दन किया गया। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था “पण्डितजी (परमानन्द) जैसे लोगों की देश को जरूरत है, जिन्हें मान-सम्मान की परवाह नहीं है”। 13 अप्रैल 1982 को परमानन्दजी संसार छोड़कर चिरनिद्रा में लीन हो गए। लोग प्यार एवं इज्जत से उन्हें पण्डितजी कहकर बुलाते थे। झाँसी की रानी के बाद उनकी बहादुरी की परम्परा को पं. परमानन्द ने आगे बढ़ाया। लोग आज भी उनका नाम इज्जत से लेते है। झांसी के स्वाधीनता संग्राम में उनका नाम रानी लक्ष्मीबाई की तरह ही स्वर्णाक्षरों से अंकित है।
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FAQ
इनका जन्म 6 जून 1892 को ग्राम सिकरौधा, तहसील राठ, जिला हमीरपुर के एक कायस्थ परिवार में हुआ था।
इनके पिता का नाम बाबू गयाप्रसाद खरे एवं माता का नाम सगुनाबाई था।
इनका जन्म 6 जून 1892 को ग्राम सिकरौधा, तहसील राठ, जिला हमीरपुर के एक कायस्थ परिवार में हुआ था।
13 अप्रैल 1982
