वर्तमान में जिस तरह आज के राजनैतिक दल धर्मों की आड़ में राजनीति करते नजर आते है यह अपने आप में बहुत दुखद भी है और शर्मनाक भी , क्या अपने कभी सोचा है यदि हिंदुस्तान की आजादी में क्रांतिकारी महिलाएं या पुरुष आपस में हिन्दू या मुस्लिम में बाँटती तो क्या हिंदुस्तान कभी आजाद हो सकता था ? पिछले लेखों में हमने देखा किस तरह से जनरल शाहनवाज खान हो ,फिर शाल आलम, बहादुर जफ़र शाह या फिर अजीजन बाई,बेगम जीनत महल, बेगम हजरत महल , हाजी इमदादुल्लाह मक्की, सय्यिद अहमद शहीद इन सब लोगों (महिलाओं तथा पुरुषों) ने अपना सब कुछ देश के लिए बलिदान कर दिया था| क्या वर्तमान के युवा और राजनीतिक दल इनके बारे में कोई चर्चा करते है या फिर इनके बारे में इतिहास लिखा गया है यह सब सवाल बनते नजर आते है आज का लेख सुलतान जमानी बेगम की जिन्दगी के बारे में है|
सुलतानी बेगम देश की उन गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों में से एक हैं. जिन्होंने 1857 के आखिरी दौर में अपने पति शहजादा फीरोज शाह के साथ शहजादा फीरोज शाह मुगलिया शासन के उस दौर का शहजादा था जब कि मिलकर आजादी के संघर्ष में हिस्सा लिया।
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जमानी बेगम और शहजादा फ़ीरोज़ शाह का इतिहास:-
बहादुरशाह जफर नाम मात्र के सम्राट रह गए थे। सम्राट के द्वारा शासन चलाना या प्रबंध रियासत तो दूर की बात थी, अपने महल की चार दीवारी से हट कर उनकी कोई सुनने वाला ही नहीं था। बहादुरशाह जफर शेर व-शायरी में अपनी जिन्दगी का शेष समय काट रहे थे। दूसरे शाहजादों में से एक नेक दिल शहजादा फ़ीरोज़ शाह, दुनिया की सभी ऐश परस्ती से दूर ख़ुदा की याद में स्वयं को व्यस्त रख हुए था। कुछ इतिहासकारों ने उसे बहादुरशाह ज़फ़र का पोता और शहजादा आलम बख़्त का बेटा एवं फ़र्रुख सियर का नवासा लिखा है। कुल कुछ मिलाकर शहजादा फ़ीरोज़ शाह इस संसार की रंगरलियों से दूर एक सूफ़ी स्वभाव ने उसे का मुग़ल था।
उसने दीन व दुनिया की तालीम हासिल करने के साथ ही मैदाने जंग का पूरा प्रशिक्षण लिया था। सुलतान जमानी बेगम, शहजादा फ़ीरोज़ शाह की बेगम थी। वह अपने पति की वफ़ादार एवं हर हाल में उसका साथ देने वाली पत्नी धौ। चाहे पति इबादतगाह में हो या मैदाने जंग में, उसने कहीं भी अपनी मर्ज़ी से उसका साथ नहीं छोड़ा। यहां तक कि जब फ़ीरोज़ शाह ने देश की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ों से मुक़ाबला किया, उस समय भी इन्होने एक स्वतंत्रता सेनानी की तरह फ़िरंगियों के दांत खट्टे करने में उस को दिया।
हज यात्रा:-
यह अपने पति फ़ीरोज़ शाह के साथ 1855 में हज यात्रा के लिए गई। इतनी दूर दराज़ का सफ़र तय करने के बाद जब वह हज करके 1857 के आखिर में वापस लौटे, तो उन्हें मुम्बई में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत की घटना की सूचना मिली। प्रथम जंगे आज़ादी में स्वतंत्रता सेनानियों की बहादुरी, उनके संघर्ष और उस के बाद अंग्रेज़ों द्वारा देश प्रेमियों पर तोड़े गऐ ज़ुल्म की दास्तान उन्होंने सुनी। वह मुगलिया वारिसों के क़त्ले आम और देश के अन्य जांनिसारों एवं उलमा-ए-दीन की शहादतों से बहुत दुखी हुए। माल व जायदाद की बर्बादी के हालात देख कर उनके अन्दर अंग्रेज़ों से बदला लेने की भावनाएं जाग उठीं। सुलतान जमानी बेगम और शहज़ादा फ़ीरोज़ शाह ने फ़िरंगियों से संघर्ष करने की तैयारी आरंभ कर दी। उधर अंग्रेज़ों को भी शाहज़ादे के इरादों का अंदाज़ा हो गया।
उन्होंने भी उसे गिरफ़्तार करने के लिए नाकाबंदी शुरू कर दी। शाहजादा फ़ीरोज़ शाह फ़िरंगी चाल से बचने के लिए ग्वालियर पहुंच गया। और वहां आज़ादी के दीगर मतवालों के सहयोग से जंगे आज़ादी का मोर्चा खोल दिया। क्योंकि सुलतान जमानी भी अंग्रेज़ शासन और देश की गुलामी को पसंद नहीं करती थीं, इस कारण उन्होंने भी शहजादे का उस संघर्ष में पूरा सहयोग किया। शाहजादा फ़ीरोज़ शाह ने मुम्बई से मन्दसौर तक आते-आते बहुत कुछ सना इकट्ठा कर ली थी। उसने अलग- अलग स्थानों पर फ़िरंगियों से बहादुरी के साथ जंग लड़ी। जिसमें अंग्रेजों का भी नुकसान हुआ और फ़ीरोज़शाह की सेना का भी।
अंग्रेज़ी सेना लड़ाई के आधुनिक हथियारों से लैस थी। जब कि फ़ीरोज़ शाह की फ़ौज बन्दकों, तलवारों और भालों आदि से मुक़ाबला करती थी। इस कारण उसे अधिकांश मोर्चों पर हार का सामना करना पड़ता था। फिर भी फ़ीरोज़ शाह के जांबाज़ सैनिकों ने अंग्रेज़ फ़ौज में हड़कंप पैदा कर रखा था।
इतिहास के पन्ने :-
सुलतान जमानी बेगम भी लड़ाई के समय जख्मी सैनिकों की मरहम पट्टी स्वयं करती एवं करवाती थीं। उनके खाने पानी अर्थात् पूरी रसद का प्रबंध करना उनका असल काम था। वह अपने पति और सैनिकों का हौसला बढ़ाती रहती थीं। सैनिकों को मैदाने जंग में जमे रहने के लिए साहस देती थी। वह अंग्रेज़ों की गुलामी की लानत से छुटकारा पाकर आज़ादी हासिल करने के लिए सैनिकों की हिम्मत बंधाती थीं।
सुलतान जमानी बेगम की जिन्दगी का आखिरी सफ़र :-
अंग्रेज़ों का दिल्ली पर पहले ही क़ब्ज़ा हो चुका था। वह हिन्दुस्तानियों पर ज़ुल्म व सितम के पहाड़ पूर्व से ही तोड़ते आ रहे थे। उसके बाद भी आज़ादी के चाहने वाले उनके विरुद्ध अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से नहीं रुके। शाहज़ादे के अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे। शाहज़ादे एवं एक अन्य स्वतंत्रता सेनानी राव साहिब की सेना का अंग्रेज़ों से आख़िरी मुक़ाबला 1859 में हुआ। इस लड़ाई में स्वतंत्रता सेनानियों को बहुत ज़्यादा जानी नुक़सान उठाना पड़ा। सैनिकों और हथियारों की कमी के कारण देशी सेना बिखर गई। यहां तक कि शाहज़ादे को सागर के जंगलों में छुपना पड़ा। उसने जंगलों में छुप कर गोरिल्ला लड़ाई लड़ने का भी प्रयास किया।
अंग्रेज़ों ने उन्हें पकड़ने के लिए जंगलों को घेर लिया। जब वह उन्हें ज़िन्दा पकड़ने में नाकाम रहे तो उन्होंने जंगलों में आग लगा दी। ऐसे ख़तरनाक हालात में वह एक अन्य रास्ते से जंगल से भाग निकलने में सफल हो गए। उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखने के लिए दीगर देशों से मदद मांगी, परन्तु उन्हें सहायता नहीं मिली। शहज़ादे ने बुखारा (उज़्बेकिस्तान) और फिर अफ़ग़ानिस्तान से भी मदद मांगी, मगर वह नाकाम रहा। अंत में शहज़ादा मक्का शरीफ़ चला गया।
वहां वह हरम शरीफ़ में इबादत करता था। शहज़ादा फ़ीरोज़ शाह, स्वतंत्रता सेनानी, का 1871 में मक्का में ही इन्तिकाल हो गया। सुलतान जमानी बेगम को दिल्ली वापस लौटने की इजाज़त नहीं मिली। अपनी ज़िन्दगी का ‘लम्बा समय देश की आज़ादी के संघर्ष में गुज़ार कर वह मुम्बई में आकर रहने लगी। सुलतान ज़मानी बेगम का भारत देश की आज़ादी के संघर्ष में योगदान उनके देश प्रेमी और आज़ादी प्रेमी होने का खुला हुआ सुबूत है |
जय प्रकाश नारायण आंदोलन SEMESTER-6 HONOURS: HISTORY PAPER: DSE 4
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