इस देश में हजारों ऐसे क्रांतिकारी हुए है जिनके बारे में वर्तमान का समाज नहीं जनता है, इसके बहुत से कारण हो सकते है लेकिन कुछ कारण तो यह है कि उनके बारे में ज्यादा लिखा नहीं गया है या फिर इतिहासकारों ने लिखने में रूचि नहीं दिखाई| इस लेख में शहीद शेर अली के बारे में चर्चा करेंगे तथा लेख लिखेंगे, यहां यह भी जानेगे कि इनका नाम क्रांतिकारियों की गुमनाम सूची में कैसे चला गया|
इस लेख को लिखने से पहले ऐसे बहुत से मुस्लिम क्रांतिकारी और उनके द्वारा लड़ी गयी लड़ाइयां है जो इस प्रकार है:-
1770 और 1779 में अंग्रेज़ों के साथ अलग-अलग क़बीलों की लड़ाइयां, 1783 में “ख़ासी” क़बीले की लड़ाई, 1798 में “गनजम” क़बीले की लड़ाई, 1804 में नाईर बटालियन की लड़ाई, 1838, 1804 का फ़रीदी आन्दोलन, 1808 में ट्रावणकोर के दीवान के साथ अंग्रेज़ों की लड़ाई, 1809 में वारों की लड़ाई, 1813 में सहारनपुर के गूजरों की लड़ाई, 1818 में ख़ान देश के भीलों की लड़ाई, 1824 में बुन्देलखंड के क़बीले की लड़ाई, 1824 में ही ” कूतरा बेलगांव” का आन्दोलन और 1831-34 में कोलियों की लड़ाई आदि है |
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शहीद शेर अलीन को इतिहासकारों ने क्यों भुलाया :-
हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए जहां ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम मशहूर हैं, जिनके नेतृत्व में हज़ारों देशवासियों ने जंगे आज़ादी में भाग लिया, उनके, आन्दोलनों, सत्याग्रहों, जलसों एवं जुलूसों के कारण इतिहास की पुरानी पुस्तकों के अनेकों पन्ने भरे पड़े हैं। इनके अलावा भी आज़ादी के ऐसे हज़ारों मतवाले गुज़रे हैं, जिन्होंने अपने जोश, वतन प्रेम के जबे, आज़ादी से मुहब्बत और गुलामी की नफ़रत से प्रभावित होकर अपने स्तर से ही फ़िरंगियों से संघर्ष किया है। जंगे आज़ादी के ऐसे ही सूरमाओं की गुमनाम सूची में शहीद शेर अली का नाम भी आता है।
शहीद शेर अलीन को काला पानी की सजा का इतिहास :-
उस समय ऐसे स्वतंत्रता सेनानी कम ही होंगे जो कि किसी तरह से अंग्रेज़ों के पंजों में फंसे हुए न हों। सरहदी सूबे का एक पठान शेर अली भी आज़ादी रूपी शमा के उन्हीं ख़ामोश परवानों में से एक था, जिसे 1867 में एक मुक़द्दमे के सिलसिले में अदालत द्वारा फांसी की सज़ा सुनाई गई। हालांकि बाद में वह सज़ा उम्र क़ैद में बदल दी गई। उन्हें उम्र कैद की सज़ा काटने के लिए कालापानी अंडमान भेज दिया गया था। शेर अली अपना शेर वाला दिल थामे हुए अपनी सज़ा के दिन काट रहे थे।
काले पानी की सख़्त सज़ाएं उनके हौसले और हिम्मत को पस्त करने के बजाय उनके दिल में फ़िरंगी शासन के विरुद्ध नफ़रत भड़का रही थीं। जैसे-जैसे समय गुज़र रहा था उनके मन में अंग्रेज़ों से बदला लेने की भावना पनपती जा रही थी। वह चाहते थे कि अंग्रेज़ों से किसी न किसी तरह बदला लिया जाए।
वायसराय लार्ड मेयो (Lord Mayo, 1822-1872) :-
जंगे आज़ादी के मतवालों ने दुश्मन फिरंगियों से बदला लेने में कभी अपनी जान की परवाह नहीं की। क्योंकि उनका जीना और मरना दोनों ही वतन के लिए हुआ करता था। फ़रवरी 1872 में हिन्द के उस समय के वायसराय लार्ड मेयो (Lord Mayo, 1822-1872) मुआयने पर अंडमान जेल आए। वहां के मुलाज़िमों और कछ क़ैदियों द्वारा भी उनका स्वागत करने की तैयारियां की गई। शेर अली तो पहले से ही अपने शिकार की ताक में बैठे थे, उन्होंने बदला लेने के लिए उस मौक़े को अच्छा जाना।
ऐसे समय जब कि जेल अधिकारी कर्मचारी लार्ड मेयो का स्वागत कर रहे थे, भारत के बहादुर शेर अली ने उस घेरे को तोड़ कर 8 फ़रवरी को लार्ड मेयो के पेट पर वार कर उनका पेट अपने छुरे से चीर डाला। इससे पहले कि साहिब का स्वागत पूरा होता, वह अधूरा ही काम छोड़ कर इस दुनिया सिधार गए।
जिन्दगी का आखिरी सफ़र तथा फांसी की सजा :-
हालांकि शेर अली को फिर से गिरफ़्तार कर इस नए जुर्म के लिए अदालत में पेश किया गया। उस घटना के बाद से शेर अली के दिल में बदले की आग कुछ ठंडी पड़ गई। अंत में हुआ वही कि अदालत के हुक्म से उन्हें 11 मार्च 1873 को फांसी के फन्दे पर लटका कर अमर शहीद बना दिया गया।
इस तरह भारत के कुछ सपूतों ने व्यक्तिगत रूप से भी अपनी जवांमर्दी दिखा कर फ़िरंगियों से गुलामी का बदला लिया है। स्वतंत्रता सेनानी शेर अली का कारनामा इतिहास में अमर रहेगा। इस तरह अपने देखा कि शेर अली को किस तरह काला पानी की सजा हुयी उसके बाद किस तरह फांसी की सजा हुयी, इतिहासकारों ने हमारे क्रांतिकारियों के साथ नाइंसाफी की जिस तरह से इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया|
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