इस लेख में संख्यादर्शन, योगदर्शन,न्यायदर्शन, वैशेषिक दर्शन, मीमांसा तथा उत्तर मीमांसा (वेदांत) के विचारों पर वर्णन करेंगे तथा परीक्षा में किस तरह से सवाल पूछे जाते है उन पर भी लेख लिखेंगे |
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संख्यादर्शन:-
यह द्वैतवादी दर्शन है अर्थात पुरुष एवं प्रकृति के संयोग से सृष्टि का विकास मानता है इसके अनुसार पुरुष अर्थात परमेश्वर निराकार एवं निर्गुण है अतः इसका वर्णन नहीं किया जा सकता | पुरुष जब जीवात्मा का रूप लेता है तब वह जीव स्वयं को कर्मों का करता मान लेता है और इस अज्ञानता वश भटकता रहता है, जबकि प्रकृति में जो परिवर्तन होते है वह हो उसकी आंतरिक क्षमता को प्रकट करते हैं इस तरह सांख्य दर्शन में आत्मा की स्वीकृति है |
इस आधार पर जैन दर्शन के निकट दिखाई देता है, सांख्य दर्शन के प्रवर्तक “कपिल” है इस दर्शन से संबंधित पुस्तक “सांख्यकारिका” है जिसकी रचना “ईश्वरकृष्ण” ने की |
योगदर्शन :-
इसके प्रवर्तक पतंजलि है जिन्होंने योग-सूत्र की रचना की, इनके अनुसार जो पहले से प्राप्त है उसे योग कहते है वस्तुतः योग के माध्यम से इन्द्रियों को तथा चेतना को नियंत्रित किया जाता है इस तरह योग नैतिक शारीरिक एवं मानसिक संयम का मार्ग है, इसके द्वारा मनुष्य चित्त में माध्यम से निकलकर स्वयं उसे अपने नियंत्रण में रखता है |
न्यायदर्शन:-
इसके प्रवर्तक “अक्षपाद गौतम” है यह तर्क पर आधारित दर्शन है, यह मोक्ष के लिए अपवर्ग शब्द का प्रयोग करता है जिसका अर्थ है इंद्रियों के बंधन से मुक्त होना, वहाँ मोक्ष का तात्पर्य दुःख के के पूर्ण विरोध की अवस्था से है |
वैशेषिक दर्शन :-
इसके प्रवर्तक “उलूक कणाद” हैं इनके अनुसार विश्व का निर्माण प्रथ्वी, अग्नि, वायु एवं जल से हुआ है |
मीमांसा :-
इसकी पर्वतक हैं इसमें वेदों के अनुष्ठानिक कार्यों पर विशेष बल दिया गया है, यह वैदिक कर्मकांड पर बल देता है इसके प्रमुख आचार्य :सबरस्वानी” हैं |
उत्तर मीमांसा (वेदांत):-
इसमें ज्ञान पर विशेष बल दिया जाता है यह वेदों की ज्ञानमयी शाखा उपनिषद से संवंधित है इसके प्रतिपादक “बादनरायण” हैं जिन्होंने “ ब्रहा सूत्र” की रचना की तथा इसके प्रमुख आचार्य ‘गौणपाद” है |
इस वेदांत दर्शन में आत्मा एवं ब्रहा के एक माना गया है| इस तरह वेदांत की द्रष्टि में केवल ब्रहा सत्य है इस तरह वेदांत मूलतः अद्वैतवादी दर्शन है, आगे चलकर शंकराचार्य ने इसी आधार पर अपने मत का प्रतिपादन किया | वेदांत से मुक्ति का अर्थ जीवन की समाप्ति से नहीं है बल्कि इसका तात्पर्य है कि हम जगत के पीछे मौजूद ब्रहा को पहचान सकें |
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FAQ
वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक “उलूक कणाद” हैं उनके अनुसार विश्व का निर्माण प्रथ्वी, अग्नि, वायु एवं जल से हुआ है |
“जैमिनी” | इसमें वेदों के अनुष्ठानिक कार्यों पर विशेष बल दिया गया है |
इसके प्रवर्तक “पतंजलि है इन्होने योग-सूत्र की रचना की थी, इनके अनुसार जो पहले से प्राप्त है उसे योग कहते है |
सांख्य दर्शन के प्रवर्तक “कपिल” है इस दर्शन से संबंधित पुस्तक “सांख्यकारिका” है जिसकी रचना “ईश्वरकृष्ण” ने की थी |
इसकी रचना “ईश्वरकृष्ण” ने की थी |
